Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
समुदेति स्वतस्तस्मात्कला कलनरूपिणी ।
जलादावर्तलेखेव स्फुरज्जलतयोदिता ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, सृष्टि के आरम्भकाल में अपनी सत्ता से स्थित हुई जगत- संस्कार के उद्रोधस्वरूप
कला (चिदाभासस्फूर्ति), जल आदि में आवर्तलेखा के सदृश, कुछ पृथक स्वरूप की नाई गुण ओर
गुणी के भेदव्यवहार की योग्यतारूप से आविर्भूत होती है