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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

सूक्ष्मा मध्या तथा स्थूला चेति सा कल्प्यते त्रिधा । पश्चान्मनस्तया तेन ज्ञातैव वपुषा पुनः ॥ ४ ॥ तिष्ठत्येतास्ववस्थासु भेदतः कल्प्यते त्रिधा । सत्त्वं रजस्तम इति एषैव प्रकृतिः स्मृता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार मध्यान्ह प्रकाश, मन्द प्रकाश और छाया में सूर्य से विभिन्न तेज के अपकर्ष की कल्पना की जाती है, उसी प्रकार उक्त कला की सूक्ष्म, मध्य तथा स्थूल यों तीन प्रकार से कल्पना की जाती है, सूक्ष्म कल्पना के पीछे उसकी कल्पना करनेवाले के द्वारा हिरण्यगर्भ के रूप से मध्य कला, फिर उसके बाद स्थूल विराट के आकार से स्थूल कला के रूप में ज्ञात होकर वह उसी प्रकार स्थित रहती है । चूँकि यह अव्याकृतोपाधिरूपा सत्व, रज ओर तमोरूपा प्रकृति त्रिधा अवस्थित है, अतएव इन सूक्ष्म आदि अवस्थाओं में भी तीन तरह से कल्पित होती हे