Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 9, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 9, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 9 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
नभसोऽप्यधिकं शून्यं नच शून्यं चिदात्मकम् ।
सूर्यकान्ते यथा वह्निर्यथा क्षीरे घृतं तथा ॥ २७ ॥
तत्रेदं संस्थितं सर्वं देशकालक्रमोदये ।
यथा स्फुलिङ्गा अनलाद्यथा भासो दिवाकरात् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सूर्यकान्तमणि में अग्नि है अथवा जैसे दूध में घी है, वैसे ही उस चिदात्मक शून्य में यह
सब अवस्थित है, जैसे अग्नि से विस्फुलिंग बाहर निकलते हैं अथवा जैसे सूर्य से रश्मियाँ बाहर
निकलती हैं, वैसे ही देश, काल और क्रम के उदयकाल में ये प्रसिद्ध सब जीवसंवित्तियाँ ब्रह्मचैतन्य
से प्रस्फुरित होती हैं, इसीलिए “अग्नि विस्फुलिंग' आदि न्याय से जीवों का उपाधियों के साथ
चैतन्य से निकलना श्रुतियों में प्रसिद्ध है, यह आशय है