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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 90, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

इत्येतदङ्ग मणियत्नकथासमानं सम्यङ्मया प्रकथितं तव पद्मनेत्र । तद्बोध्यमेवममलं स्वयमेव बुद्ध्वा यद्वेत्सि तत्परिणतिं नय चित्तकोशे ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त चिन्तामणि के साधक के चरित्र की समता का उपसंहार करते है। हे पद्मनेत्र महीपते, इस तरह चिन्तामणि के प्रयत्न की कथा के समान आपके चरित्र को मैंने अच्छी तरह प्रकट कर दिया, अब आप मेरे कहने के अनुसार स्वयमेव अपनी बुद्धि से निर्मल उस बोध्य वस्तु का तत्वतः विचारकर सर्वत्याग या तप-इन में चिन्तामणि के समान जिसे निर्दोष समञिये, उसीको अपने चित्तकोश के भीतर रखकर फलप्राप्तिपर्यन्त परिणति में पहुँचाइये