Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 91, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
चूडालोवाच ।
इदानीं राजशार्दूल वस्तुसंप्रतिपत्तये ।
शृणु विन्ध्येभवृत्तान्तविवृतिं स्मयकारिणीम् ॥ १ ॥
योऽसौ विन्ध्यवने हस्ती सोऽस्मिन्भूमितले भवान् ।
यौ वैराग्यविवेकौ तौ द्वौ तस्य दशनौ सितौ ॥ २ ॥
यश्चासौ वारणाक्रान्तितत्परो हस्तिपः स्थितः ।
तदज्ञानं तवाक्रान्तितत्परं तव दुःखदम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
नब्बेवाँ सर्गे समाप्त
इक्यानबेवाँ
इक्यानबेवाँ सर्ग
तत््वज्ञानसम्पादक सर्वत्याग की सिद्धि के लिए विन्ध्यगजवृत्तान्तरूपी दृष्टान्त का
राजा शिखिध्वज के चरित्र मे समन्वय ।
चूडाला ने कहा : हे राजशार्दूल, पूर्णततत्वबो ध के लिए अव आप विन्ध्याचल के हाथी के वृत्तान्त की
विस्मय उत्पन्न करनेवाली विवृत्ति सुनिये । विन्ध्यवन में रहनेवाले जिस हाथी का मैंने आपसे पहले
वर्णन किया था, वह इस पृथिवीतल पर आप ही हैँ । उस हाथी के जो सफेद दो दाँत हैं वे ही आपके
वैराग्य और विवेक हैं । हाथी की आक्रान्ति में यानी हाथी पकड़ने में तत्पर जो वह महावत स्थित था,
वह आपकी आक्रान्त में तत्पर आपको दुःख देनेवाला आपका अज्ञान है