Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verses 4–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 91, verses 4–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
अतिशक्तोऽप्यशक्तेन दुःखाद्दुःखं भयाद्भयम् ।
हस्ती हस्तिपकेनेव राजन्मौर्ख्येण नीयसे ॥ ४ ॥
यल्लोहवज्रसारेण वारणः परियन्त्रितः ।
तदाशापाशजालेन भवानापदमावृतः ॥ ५ ॥
आशा हि लोहरज्जुभ्यो विषमा विपुला दृढा ।
कालेन क्षीयते लोहं तृष्णा तु परिवर्धते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, आप
अत्यन्त शक्तिसम्पन्न हाथी के सदृश रहते हुए भी दुर्बल मूर्खतारूपी महावत के द्वारा एक दुःख से दूसरे
दुःख में तथा एक भय से दूसरे भय में पहुँचाये जा रहे हैँ । जो मोहवज्रसार से हाथी बोधा गया था, सो
आशापाशजाल से पैर से लेकर मस्तक तक आवृत्त हुए (बोधे गये) आप ही हे । आशा तो लोहे की
जंजीर से भी बढ़कर भयंकर, विशाल और दृढ़ है, क्योकि काल पाकर लोहे की जंजीर टूट जाती हे,
परन्तु तृष्णा तो बढती ही जाती है