Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 91, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यद्द्वन्द्वं प्रेक्षते वैरी गजमारादलक्षितः ।
प्रेक्षते त्वां तदज्ञानं क्रीडार्थं बद्धमेककम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
“रिपौ हस्तिपके दूरादपशथ्यति स वारणः“ (दूरी के कारण न देख रहा उसका शत्रु महावत जब
चिन्तन कर रहा था, तब उस हाथी ने) इससे सूचित उसके चिन्तन का उदाहरण देते हैं।
जो एकान्त में छिपकर शत्रु महावत हाथी का चिन्तन कर रहा था वह आपका अज्ञान ही (00)
एकान्त में अकेले वधे हुए क्रीडा के लिए आपका चिन्तन कर रहा था