Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 21–25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verses 21–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 21-25
संस्कृत श्लोक
कुम्भस्त्वालोकयन्नेव तत्क्रियाः सस्मितः स्वयम् ।
आसने लोककार्येषु स्वस्यन्दन इवांशुमान् ॥ २१ ॥
यत्करोति करोत्वेतदस्यैतत्पावनं परम् ।
इति तूष्णीं स्थितः कुम्भः शिखिध्वजमवैक्षत ॥ २२ ॥
शिखिध्वजस्तु तत्सर्वं भाण्डोपस्करमाश्रमात् ।
एकत्रैवानयामास भुवो वार्यब्धिभूरिव ॥ २३ ॥
तत्संस्थाप्येन्धनैः शुष्कैर्ज्वालयामास पावकम् ।
करैः संचारवानर्कः सूर्यकान्तपदं यथा ॥ २४ ॥
भाण्डोपस्करजालं तदग्नौ त्यक्त्वा विवेश सः ।
ध्वंसिकायां जगद्धुत्वा मेरुश्रृङ्गे यथा रविः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने आसन पर स्थित वह कुम्भ ऋषि मुसकुराता हुआ राजा शिखिध्वज की सारी
क्रियाँ उस तरह देख रहा था, जिस तरह अपने रथ पर अवस्थित हुए भगवान् सूर्यदेव लोक के कार्य
देखते रहते हैं जो यह करता है, यह करे । इसके लिए यही परम पावन है, ऐसा विचार कर चुपचप
अवस्थित हो वह कुम्भ ऋषि राजा शिखिध्वज की ओर देखता रहा । राजा शिखिध्वज ने भाण्डादि
उन सब वस्तुओं को अपने आश्रम के भीतर से लाकर उन्हें एक ही जगह उस तरह रख दिया, जिस
तरह समुद्र के उदर की नीची भूमि उन्नत पृथिवी से नदी आदि के जल को । उन्हें एक जगह करके
सूखी लकड़ियों के द्वारा अग्नि को उस तरह प्रज्वलित किया, जिस तरह अपनी किरणों से संक्रान्त
सूर्य सूर्यकान्तमणि के स्थान में अग्नि को | भाण्डे आदि उन सब वस्तुओं को अग्नि में छोडकर वह
अपने आसन पर उस तरह आसीन हो गया, जिस तरह मन्वन्तर के सन्धिप्रलय में भगवान् सूर्यदेव
स्वप्रज्वलित अग्नि में संसार का हवनकर सुमेरु शिखर पर आसीन हो गये थे