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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 26–27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 26, 27

संस्कृत श्लोक

एतावन्तं मया कालं वृत्ता यत्त्वं पतिप्रिये । अजातबुद्धिभेदेन तेनैव कृतमस्तु ते ॥ २६ ॥ भ्रान्तौ तु विनिवर्तिन्यां नाधुनोपकरोषि माम् । मन्त्राटव्यां चिरं भ्रान्तं विहृतं कार्यवर्त्मसु ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अव अक्षमाला छोड़ने की इच्छा से किये गये उपकार को भूल जाना जो एक दोष है उसका परिहार कर रहे राजा शिखिध्वज उस अक्षमाला से कहते है। हे पतिप्रिये, मेरे इस कार्य से दूसरे को अवश्य क्लेश होगा, ऐसा विचारकर मैंने अपनी स्वार्थसाधन की बुद्धि का कभी उच्छेद न करके तुम्हें इतने समय तक जो परिवर्तनरूपी श्रम में पहुँचाया, उसीसे आवश्यकता से अधिक तुम मेरी सेवा कर चुकी हो, अतः उतनी ही रहे । अब तो तप, जप आदि कर्तव्यरूपी भ्रान्ति के दूर चले जाने पर तुम मेरा उपकार नहीं कर सकती, इसलिए तुम्हें श्रम देना मैं उचित नहीं समझता। मैं तुम्हारे साथ मन्त्ररुपी जंगल में तथा क्रियासे साध्य होनेवाली छोटी-छोटी सिद्धियों के पथ पर बहुत दिनों तक भटकता रहा