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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 32–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verses 32–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 32-37

संस्कृत श्लोक

नृपोऽग्नावम्बुधेर्वातो दववह्नाविवाचलात् । महावृत्तेन भवता त्वया वारि धृतं मम ॥ ३२ ॥ साधो कमण्डलो सम्यङ् न ते प्रतिकृतं कृतम् । सौहृदस्य मनोज्ञस्य सौजन्यस्यस्थिरस्य च ॥ ३३ ॥ साधुत्वस्य च सर्वस्य त्वमेव परमास्पदम् । येनैव वह्निना देहं संशोध्याभ्यागतोऽसि माम् ॥ ३४ ॥ तेनैव गच्छ हे मित्र पन्थानः सन्तु ते शिवाः । इत्युक्त्वा श्रोत्रियायैव कमण्डलुमदात्तदा ॥ ३५ ॥ अग्नये महते वापि दातव्यं साधु यद्भवेत् । मूर्खस्येव मतिर्गुप्ते नित्यमेव पतस्यधः ॥ ३६ ॥ उचिता ते गतिः सैव बृसिके भस्मतां व्रज । इत्युक्त्वादाय बृसिकामग्नावेव स मृद्विकाम् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

अव कमण्डलु छोड़ने की इच्छा कर रहे राजा शिखिध्वज अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए उसकी प्रशंसा करते हैं। हे साधो कमण्डलो, तुम सुन्दर गोल-मटोल आकार से युक्त बनकर मेरे लिए जल रखते रहे । तुम्हारी इस सुन्दर मेत्री ओर स्थिर सौजन्य का मैं अच्छी तरह प्रत्युपकार न कर सका - बदला न चुका सका । सम्पूर्णं साधुत्व का परम आस्पद तुम्हीं हो । हे मित्र, जिस अग्निपथ से देह को शोधित कर मेरे पास आये हो, उसी पथ से फिर चले जाओ । मित्र, तुम्हारे मार्ग सुखदायक हों | यह कहकर उसी समय राजा शिखिध्वज ने श्रोत्रिय ब्राह्मण को कमण्डलु दे दिया (८) । जो कोई अच्छी वस्तु हो, वह किसी महात्मा को दे देनी चाहिए या अग्नि में जला देनी चाहिए, ऐसा नियम हे । हे आसन, जिस तरह मूर्खं पुरुष की बुद्धि अधोगति के हेतु प्रच्छन्न पाप में गिरती है, उसी तरह तुम भी सदा अपने से प्रच्छन्न अधोदेश में ही गिरते हो, इसलिए हे आसन, तुम्हारी भी वही दाहसन्तापगति उचित है, अतः भस्मरूप हो जाओ, यह कहकर उस राजाने उस कोमल आसन को चित्त की शुद्धि के लिए तथा ब्रह्मचैतन्य में विश्रान्ति के लिए धधकती आग में छोड दिया