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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

शुद्ध्यर्थमासनार्थं वै चिति तत्याज भासुरे । यत्त्याज्यमचिरेणैव त्यक्तव्यं किल तत्सदा ॥ ३८ ॥ विस्तरः क्रियते सद्भिरुपादेये इति स्थितिः । शीघ्रमग्नाविदं सर्वं भाण्डजातं त्यजाम्यहम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे साधो, जो वस्तु त्याज्य है उसका सदा शीघ्र त्याग कर देना चाहिए, क्योकि विद्यमान उन सभी वस्तुओं से संग्रह करने योग्य दूसरी वस्तु में भी विस्तार किया जाता है, ऐसी लोक में वस्तुस्थिति प्रसिद्ध है; इसलिए मैं इन सभी वस्तुओं को शीघ्र ही आग में छोड देता हू । यदि इन सबको आग एक ही बार में जला देती है, तो मेरे सर्वत्यागरूपी सन्तोष के लिए बिलकुल ठीक है