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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 40–41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verses 40–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 40,41

संस्कृत श्लोक

एकवारं दहत्यग्निर्दाह्यं भवति तुष्टये । साधो क्रियोपकरणं निष्क्रियाय त्यजाम्यहम् । न खेदस्तत्र कर्तव्यो नन्वयोग्यं बिभर्ति कः ॥ ४० ॥ इत्युक्तवान्झटिति भोजनभाजनाद्यं सर्वं जुहाव वनवासविलासयोग्यम् । तद्भाण्डजालमनले सममेव राजा कल्पान्ततेजसि जगज्ज्वलतीव कालः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे साधो कुम्भ, मैं निष्क्रिय होने के लिए क्रियोपयोगी सभी वस्तुओं को छोड रहा हूँ, इसलिए मेरे द्वारा किये गये सर्वत्याग के विषय में मित्र, तुम खेद न करना; क्योकि इस संसार में अयोग्य वस्तु को (विना काम के पदार्थ को) कौन ढोते-फिरता है - अयोग्य की कहीं पूछ नहीं रहती । हे श्रीरामजी, यह कहकर सम्पूर्ण भोजनपात्र आदि उस भाण्डसमूह को, जो वनवासविलास के योग्य था, एक ही साथ आग में राजाने उस तरह हवन कर दिया, जिस तरह धधक रही कल्पान्त की आग में काल सम्पूर्ण संसार को एक ही साथ हवन कर देता है