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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 92, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

चूडालोवाच । धनं दारा गृहं राज्यं भूमिश्छत्रं च बान्धवाः । इति सर्वं न ते राजन्सर्वत्यागो हि कस्तव ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

केवलं सर्वत्यागे शेषिताहमतिस्त्वया” (आपने सर्वत्याग में केवल अभिमानरूप अविद्या को उस तरह बचा रखा है) इससे तो मैंने पहले ही इसका उत्तर दे दिया है। परन्तु विवेक न होने के कारण यह उसे समझ नहीं सका, इसलिए जंगल में निवास, कमंडलु आदि अवशिष्ट परिग्रह का भी पूर्णरूप से त्याग करा दिये जाने पर किसी तरह विवेक प्राप्त कर अहंकारग्रन्थि तोड़ करके यह परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हो जायेगा-ऐसा सोचती हुई धीरे-धीरे राजा शिखिध्वज की बुद्धि को विचार पथ पर उतार रही कुम्मरूपिणी चूडाला गूढ अभिप्राय से कहती हैं । हे राजन्‌, धन, स्त्री, गृह, राज्य, भूमि, छत्र और बान्धव - ये सब आपके तो हैं ही नहीं, फिर आपका सर्वत्याग हुआ कौन ? तात्पर्य यह कि जो अपना सम्बन्धी और सब है उसीका त्याग होने पर सर्वत्याग की सिद्धि होगी, परन्तु राज्यादि तो न आपके सम्बन्धी हैं न और सब हैं, क्योंकि 'राज्य आदि मेरे है" एेसी कल्पना कर रहा अहंकार ही अपने को इनका स्वामी मानता है, आत्मा नहीं मानता; अतः आप में सम्बन्धिता न होने से आपका सर्वत्याग सिद्ध नहीं हुआ