Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
क्षोभयत्यन्य एवैनं निग्रहार्हो मुहुर्बलात् ।
तपस्विनं यथैकान्तं संस्थितं मत्ततस्करः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका अपराध है, उस अन्य व्यक्ति को दिखलाते हैं।
जैसे एकान्त में अवस्थित तपस्वी को उन्मत्त चोर बलपूर्वक बारबार क्षोभ पहुँचाता है, वैसे ही
इस आत्मा को भी कोई दूसरा ही बार बार बलपूर्वक उन्मत्त चोर क्षोभ पहुँचाता है, अतः वही दण्ड
देने योग्य हे