Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 19–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
जडो वराको मूकात्मा तपस्वी देहको ह्ययम् ।
न कश्चन तवैतस्मिन्मा मुधैव तनुं त्यज ॥ १९ ॥
आत्मन्येवैष मूकात्मा ध्यानवानवतिष्ठते ।
संचाल्यते परेणैव तरङ्गेणैव काष्ठकम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
शरीर का कोई अपराध नहीं है, यह दिखलाते हैं।
यह बेचारा तपस्वी शरीर तो जड़ और मूकात्मा है। इसने आपका कोई अपराध नहीं किया है, अतः
व्यर्थ ही इस शरीर का त्याग मत कीजिये । यह मूकात्मा अपने आत्मा मेँ ही ध्यानवान् होकर अवस्थित
रहता है। यह दूसरे के ही द्वारा उस तरह संचालित किया जाता है, जिस तरह तरंग से काष्ठ