Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
येन सर्वं परित्यक्तं तस्मिञ्छून्येऽपि संस्थितम् ।
जगत्सर्वं त्रिकालस्थं तन्तौ मुक्तावली यथा ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
जो सब छोड रहा है उसने तो सबकी शून्यता ही मान ली, फिर सब उसके अधीन बनकर लब्ध कैसे
होंगे, इस पर कहते हैं।
जिसने सर्वत्याग किया है उस शून्यस्वरूप में, तन्तु में मोतियों की तरह, तीनों कालों में अवस्थित
सम्पूर्ण जगत् अवस्थित है । निष्कर्ष यह है कि सब कुछ छोड़कर वह त्यागी यद्यपि सर्वशून्यस्वरूप हो
गया है, तथापि उसके द्वारा छोड़ा गया जगत्-अन्य आश्रय न मिलने के कारण - उसीका आश्रय कर
व्यवहारपर्यन्त सत्तास्फूर्ति प्राप्त करता है, इसलिए व्यवहारियों की दृष्टि से त्रिकाल में रहनेवाले सब
पदार्थो को वही प्राप्त करता है, यों कहा जाता हे