Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 62–64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 62–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 62-64

संस्कृत श्लोक

सर्वत्यागो महाराज सर्वसंपत्समाश्रयः । न गृह्णाति हि यत्किंचित्सर्वं तस्मै प्रदीयते ॥ ६२ ॥ कृत्वा सर्वपरित्यागं शान्तः स्वस्थो वियत्समः । सौम्यो भवसि यद्रूपस्तद्रूपो भव भूपते ॥ ६३ ॥ सर्वं परित्यज्य महास्वभाव त्यजस्यथो येन च तद्विहाय । त्यागाभिमानं च मलं विमुच्य विमुक्तरूपो भव भूमिपाल ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महाराज, सर्वत्यागसम्पूर्ण सम्पत्तियों का निवासस्थान है, क्योकि जो कुछ नहीं लेता उसे सब कुछ दिया जाता हे । हे भूपते, सबका परित्याग करके शान्त, स्वस्थ ओर आकाश के समान सौम्य जो रूप आप हो रहे हैं तद्रूप ही हो जाइये । हे भूमिपाल, आप पहले जो त्याज्य पदार्थ हैं उन सबका मनसे परित्याग कर, अनन्तर जिस मन से परित्याग कर रहे है उस मन का त्यागकर उसके बाद त्यागाभिमानरूप अहंकार मल का भी त्यागकर जीवन्मुक्तरूप हो जाड्ये