Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 59–61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 59–61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 59-61
संस्कृत श्लोक
सर्वं त्यजति यस्तस्य सर्वमेवोपतिष्ठते ।
यथैवाम्बु विशत्यग्नौ तथैवायाति वारिधौ ॥ ५९ ॥
सर्वत्यागान्तरेवास्ति ज्ञानमात्मप्रसादकम् ।
यच्छून्यं किल भाण्डस्य तत्र रत्नादि तिष्ठति ॥ ६० ॥
सर्वत्यागवशादेव हृतकाले कलावपि ।
शाक्येन विगताशङ्कं मुनिना मेरुवत्स्थितम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वत्याग मे वैभव की हानि होती है, इसका खण्डन करते हैं।
जो पुरुष सबका त्याग कर देता है उसके पास प्रारब्ध द्वारा सम्पूर्ण विभव -समूह उस तरह उपस्थित
होता है, जिस तरह ज्यों -ज्यों वडवाग्नि में जल प्रविष्ट होता है, त्यों -त्यो समुद्र मेँ नदियों से जल
आता ही रहता हे । अज्ञान और उसके कार्य का जो त्याग हे उसके भीतर आत्मप्रसादक ज्ञान अवश्य
उपस्थित रहता हे । हे राजन्, यह प्रसिद्ध है कि पात्र के भीतर जो शून्य स्थान होता है वहीं रत्नादि रहता
हे । अत्यंत पापिष्ठ कलिकाल में भी वेदों से बहिष्कृत होने के कारण अति नीच भी वह शाक्य मुनि
सर्वत्याग के कारण ही निःशंक होकर सुमेरु के समान अवस्थित था । हे राजन्, तब तो इस पुण्यमय
द्वापर काल में वेदमार्गं का अवलम्बन करनेवाले पुण्यतम आपको निःशंक होकर आकाश के समान
अवस्थित रहना ही चाहिए, इस विषय में अधिक हम क्या कहें