Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verses 55–58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verses 55–58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 55-58
संस्कृत श्लोक
सर्वत्यागो हि शून्यात्मा आश्रयः सर्वसंविदाम् ।
अनन्तानामुदाराणां खमिवेदं दिवौकसाम् ॥ ५५ ॥
सर्वत्यागरसापाने जरामरणभीतयः ।
न काश्चन प्रबाधन्ते खस्येव व्योमलेखिकाः ॥ ५६ ॥
सर्वत्यागो महत्त्वस्य कारणं निर्मलद्युतेः ।
सर्वं त्यजसि चेद्यस्माद्बुद्धिस्थैर्यं बृहत्तमम् ॥ ५७ ॥
सर्वत्यागः परानन्दो दुःखमन्यत्सुदारुणम् ।
इत्योमित्युररीकृत्य यदिच्छसि तदाचर ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
अतिरिक्त ओर सब कुछ भयंकर दुःखरूप है - इसे विचारपूर्वक ॐ यों स्वीकार कर आप उसी का
आचरण कीजिए, जिसे चाह रहे हे