Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 93, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 93, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 93 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
समस्तवस्तुदाहेऽपि यथा त्वं नेतरो नृप ।
सर्वत्यागत एवाङ्ग तथा निर्वाणमुच्यते ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
परिशिष्ट विति अपने से अतिरिक्त है, अतः उससे अपना कौन-सा पुरुषार्थ सिद्ध होता है, इस
पर कहते है।
हे राजन्, समस्त वस्तुओं के जल जाने पर भी जैसे आप अन्य नहीं हुए, वैसे ही सर्वत्याग से
होनेवाला परम पुरुषार्थरूप मोक्ष भी आपसे भिन्न नहीं होगा, ऐसा हम कहते हैं