Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
चित्तत्यागादहं मन्ये चित्तनाशः सुसिद्धये ।
अभावः शतशो व्याधेः कथमस्यानुभूयते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ का विमर्श कर अनुवादपूर्वक उसका अनुमोदन कर रहे राजा शिखिध्वज उसमें उपपत्ति
बतलाते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, उत्तम सिद्धि के लिए मैं चित्तत्याग से तो अच्छा चित्तनाश ही
समझता हूँ, परंतु सैकड़ों व्याधि का मूलस्थान इस चित्त का अभाव कैसे अनुभूत होता है सो कहिए
अर्थात् चित्त एक तरह की व्याधि है और व्याधि का अभाव सैकड़ों बार ममतानिवृत्तिरूपी त्याग से
किसी तरह दूर हुआ अनुभूत नहीं होता, किंतु चिकित्सा द्वारा नाश कर देने से ही अनुभूत होता है अतः
उसके विनाश के लिए उसके मूल, शाखा ओर पल्लव आदि सब कहिए