Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
परमात्मपदं क्षेत्रं क्षेत्रं मायामयस्य तत् ।
एतस्मात्प्रथमोद्भिन्नादंकुरोऽनुभवाकृतिः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
परमात्मा की माया ही इस मायामय प्रपंच का खेत हे । चूँकि सब मायामय प्रपंच का खेत
वह है, इसलिए इस चित्त का भी वही खेत है। परमात्मपद यानी माया, यह भाव है । (इसका कौन अंकुर
है, इस प्रश्न का उत्तर देते हैं।) इस प्रथम उत्पन्न मूल से परिच्छिन्न “मैं” इस तरह का निश्चयरूप,
चिदाभास से व्याप्त होने के कारण, अनुभव ही इसका अंकुर होता हे