Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 28–29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 28–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 28,29
संस्कृत श्लोक
चित्तकण्टकखण्डस्य भवत्येवमचित्तता ।
शिखिध्वज उवाच ।
अहंभावात्मनश्चित्तद्रुमबीजस्य हे मुने ।
कोऽनलो दहनाख्येऽस्मिन्कर्मण्यर्थकरो भवेत् ॥ २८ ॥
कुम्भ उवाच ।
राजन्स्वात्मविचारोऽयं कोऽहं स्यामिति रूपधृक् ।
चित्तदुर्द्रुमबीजस्य दहने दहनः स्मृतः ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
मूलदहन प्रसिद्ध अग्नि से नहीं हो सकता, इसलिए दूसरी अग्नि जानने की इच्छा से राजा पूछते हैं ।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुने, अहंभावात्मक चित्तरूपी वृक्ष के वीज के दहन नामक इस कर्म में
कौन-सी अग्नि समर्थ होगी अर्थात् चित्तरूपी दुष्ट वृक्ष के बीज को जलाने में कौन अग्नि समर्थ होगी ?
कुम्भ ने कहा : हे राजन् “में यह कौन हूँ” इस तरह का आरम्भ से लेकर आत्मसाक्षात्कारपर्यन्त
स्वात्मविचार ही चित्तरूपी निकृष्ट वृक्ष के बीज के दहन में अग्नि कही गयी हे