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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

कटकत्वं यथा हेम्नि तथाहंत्वं चिदात्मनि । जडं त्वसद्रूपतया तेन तन्नास्ति हे मुने ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार में जड़ता नहीं है, इस शंका का विवर्तत्व हेतु से निवारण कर रहे राजा शिखिध्वज: जड़ में स्वतः सिद्ध होने की शक्ति न होने से विति के अध्यास से उसकी सिद्धि होने पर उसमें मिथ्यात्व ही अन्त में चलकर आ जाता है - यह कहते हैं। हे मुने, जैसे सुवर्ण में कटकत्व है यानी सुवर्ण से अलग कटक कोई पदार्थ नहीं है, किंतु सुवर्ण का ही विवर्त कटक है; वैसे ही चिदात्मा मेँ अहन्ता है यानी चिदात्मा से अलग अहन्त्व कोई पदार्थ नहीं है, विवर्तं अहन्त्व है ओर जड (शुक्ति-रजत, मृगतृष्णा आदि) तो असद्रूप से प्रसिद्ध हैं ही, इससे यानी जडत्व हेतु से अहन्त्वादि नहीं है अर्थात्‌ मिथ्या ही हैं