Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
संनिवेशनिवासात्मा सर्वार्थादिः परे पदे ।
विद्यते नान्यदन्यत्वान्नभसीव महाद्रुमः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त ब्रह्माण्ड आदि जडवर्ग, अधिष्ठान सद्रूप से अन्य होने के कारण भी, असत् है ।
आकाश में आकाश से भिन्न दूसरे महावृक्ष की नाई परमपद चिति में चैतन्य से भिन्न कोई दूसरा
ब्रह्माण्ड आदि पदार्थ, अन्यत्वहेतु से ही नहीं रहता। यदि यह कहिये कि ऐसा क्यो, तो इसका उत्तर यह
है । ब्रह्माण्डादि जड वर्ग-चौदह भुवन आदि अवयवो का आधार तथा समस्त शब्द आदि विषयो का -
कारण है ओर चिदात्मा तो विभागशून्य सत्तासामान्यस्वरूप होने के कारण विभक्तस्वभाव नहीं है