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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 39–41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 39–41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 39-41

संस्कृत श्लोक

असदेतदनात्मीयं प्रमार्ष्टुं मलमात्मनः । मुने यदा न शक्नोमि तेन तप्ये सुदारुणम् ॥ ३९ ॥ कुम्भ उवाच । ब्रूहि किं तन्महाबाहो लग्नं तव मलं महत् । स्थितोऽसि येन संसारी सता वाप्यथवाऽसता ॥ ४० ॥ शिखिध्वज उवाच । चित्तद्रुमस्य यद्बीजमहंभावश्च मे मलम् । तच्च त्यक्तुं न जानामि त्यक्तं त्यक्तमुपैति माम् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुने, यह असत्यस्वरूप और आत्मा के साथ तनिक भी सम्बन्ध न रखनेवाले मल को धो डालने में मैं समर्थ नहीं हो रहा हूँ, इसलिए दारुणरूप से मैं सन्तप्त हो रहा हू । कुम्भ ने कहा : हे महावाहो, सत्यस्वरूप हो अथवा असत्यस्वरूप हो, जिस मल के प्रभाव से आप संसारी बनकर बैठे है वह लगा हुआ आप में बड़ा मल क्या है, उसे बतलाइये । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे भद्र, वह मल सत्य है या असत्य, इसे तो नहीं जानता हूँ, परन्तु समस्त अनर्थरूप फल देनेवाले चित्तरूपी वृक्ष का वह मूल है, यों सामान्यरूप से उसे तो मैं जानता ही हूँ, विशेषरूप से भी वह अहंभाव एवं ममभाव रूप हे, यों जानता हू । इस तरह सामान्य ओर विशेषरूप से जानता हुआ भी उस मल को छोड़ने के लिए मैं कोई उपाय नहीं जानता यद्यपि “अहं, "मम बुद्धि के अभाव से उस मल का बार-बार मैंने परित्याग किया, तथापि उसके मूल का उच्छेद न होने के कारण बार-बार आकर वह मुझे लग जाता है, अतः उसके मूल के उच्छेद का उपाय मुझसे कहिए, यह निष्कर्ष हे