Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
कारणाज्जायते कार्यं यत्तत्सर्वत्र संभवेत् ।
अन्यत्त्वसद्द्विचन्द्राभं दृष्टमेतन्न विद्यते ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
*कूटस्थ होने से सत्य वस्तु कारण हो ही नहीं सकती, असत्य वस्तु कारण है“ यह कहना तो
असत्यभूत कारण में कार्य उत्पन्न हुआ, इस अर्थ मेँ पर्यवसित होकर कार्य की असत्यता को ही सिद
करता है । इस तरह पर्यवसित हुए आत्मा के एकत्वरूप रहस्य को राजा की बुद्धि के अनुसार ही
समझानेवाले कृम्भ-लोकप्रतिद्धि के अनुरूप अहंकार का कारण आप ही अपनी बुद्धि से खोज कर
कहिए - यह कहते हैँ ।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, जो कार्य कारण से उत्पन्न होता है वह सर्वत्र ही उत्पन्न होगा, क्योकि
भलीर्भोति विचार करने से ऐसे कार्य की सत्ता प्रतीत ही नहीं होती