Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
अविद्यमानमेव त्वं विद्धि मिथ्याभ्रमोदितम् ।
नातियत्नवतोऽप्येतन्मृगतृष्णाम्बु लभ्यते ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्याभ्रम से उदित हुए शरीर आदि को आप अविद्यमान ही जानिये,
क्योंकि अत्यधिक यत्नशील मनुष्य को भी यह मृगतृष्णाजल लब्ध नहीं होता