Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
अकारणं तु यत्कार्यं सदिवाग्रेऽनुभूयते ।
तद्द्रष्टुर्विभ्रमाद्विद्धि मृगतृष्णाजलोपमम् ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्,
बिना कारण के जो कार्य सामने सत् की नाईं अनुभूत होता है उसे मृगतृष्णाजल के सदृश देखनेवाले के
विभ्रम से उत्पन्न समझिए