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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 94, Verses 61–64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 94, verses 61–64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 94 · श्लोक 61-64

संस्कृत श्लोक

कुम्भ उवाच । कारणाभावतो राजन्पिता नाम न विद्यते । असतो यत्तु संजातमसदेव तदुच्यते ॥ ६१ ॥ पदार्थानां च कार्याणां कारणं बीजमुच्यते । संभवत्यङ्ग जगति न बीजेन विनाङ्कुरः ॥ ६२ ॥ तस्मान्न कारणं यस्य कार्यस्येहोपपद्यते । बीजाभावे हि तन्नास्ति तत्संवित्तिस्तु विभ्रमः ॥ ६३ ॥ अवश्यं खलु यन्नास्ति निर्बीजं तन्मतिभ्रमः । द्वीन्दुत्वमरुभूम्यम्बुवन्ध्यापुत्रदशासमम् ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी भी कोई सत्ता नहीं है, दोनों में एक ही न्याय समानरूप से लगता है, इस गूढ अभिप्राय से युक्त कुम्भ ऋषि उसी उत्तर को फिर कहते है । कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, कारण का अभाव होने से सचमुच पिता भी नहीं हे । जो पदार्थ असत्‌ से उत्पन्न हुआ रहता है वह भी असद्रूप ही कहा जाता हे । कार्यभूत पदार्थो का कारण बीज कहा जाता है। हे राजन्‌, इस संसार में बिना बीज के अंकुर नहीं उत्पन्न होता । इसलिए जिस कार्य का कारण नहीं है वह कार्य भी बीज का अभाव रहने से नहीं है । जो उसका ज्ञान मनुष्य को होता है वह तो बिलकुल विभ्रम हे । अवश्य ही जो वस्तु बीजशून्य है वह है ही नहीं । अतः उसका जो मनुष्य को ज्ञान होता है वह - दो चन्द्र, मरुभूमि में जल ओर वन्ध्यापुत्र की दशा के समान - बुद्धिविभ्रम है