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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

मिथ्यादृष्टिप्रेक्षितं तु न कदाचन विद्यते । मृगतृष्णाम्भसा केन घटकाः परिपूरिताः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए विचार द्वारा मिथ्यारूप से देखा गया पदार्थ अर्थक्रिया के साथ स्वरूप से भी वंचित हो जाता है, यह कहते हैं। मिथ्याज्ञान के कारण दिखाई पड़नेवाला पदार्थ किसी काल में भी अस्तित्व नहीं रख सकता, क्या कहीं किसीने मृगतृष्णाजल से घड़े भरे हैं ?