Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
स्रष्टुराद्यस्य परमं ब्रह्म कस्मान्न कारणम् ।
अनन्तमजमव्यक्तमम्बरं शान्तमच्युतम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो पितामह के प्रति निर्विशेष ब्रह्म ही कारण क्यो नहीं होता ? यदि कहो कि परिणामी होने पर
वह अनित्य हो जायेगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योकि क्रमशः हुए सब परिणामों में अनुवृत्ति होने के
कारण घटत्वादिरूप जाति के सदश उसकी नित्यता आ सकती है, यों राजा शंका करते हैं।
राजा शिखिध्वज ने कहा : हे मुनिश्वर, आदि सर्जक हिरण्यगर्भ का अनन्त, अजन्मा, अव्यक्त,
चिदाकाश, अविनाशी, सर्वोपद्रवशून्य, सर्वातिशायी, निर्विशेष ब्रह्म कारण क्यों नहीं है ?