Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
हेतुत्वाभावतो ब्रह्म कार्यत्वाभावतस्तथा ।
अद्वैतेनातिगन्तात्मा न च कार्यं न कारणम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रति, युक्ति ओर अनुभव का विरोध होने से हिरण्यगर्भ का कारण निर्विशेष ब्रह्म नहीं हो सकता,
ऐसा कहते हैं।
कुम्भ ने कहा : हे राजन्, शुद्ध निर्विशेष ब्रह्म न तो कार्य है और न कारण ही है, क्योकि
“तदेतद्ब्ह्मा पूर्वमनपरम्” इस श्रुति से पूर्वत्वरूप कारणत्व का और अपरत्वरूप कार्यत्व का निषेध
किया गया है। नह नानास्ति किंचन“ इस श्रुति से द्वैतमात्र का निषेध किया गया है । “असंगो ह्ययं
पुरुषः" इस श्रुति से उसकी अनुवृत्ति का निषेध किया गया है ओर कूटस्थ का परिणाम न बनने के
कारण वह सर्वप्रपंच से निर्मुक्त है