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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

अकर्तृकर्मकरणमकारणमबीजकम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं ब्रह्म कर्तृ कथं भवेत् ॥ १३ ॥ अकारणत्वात्कार्यत्वरहितं तज्जगद्भवेत् । अद्वैतैक्यमनाद्यन्तं तदाद्यमुपलम्भनम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य कारकों की अप्रसिदि होने से उनको लेकर इसमें स्वातन्त्रयरूप अकर्तृत्व भी नहीं आ सकता, यह कहते हैं। ब्रह्म न कर्ता है, न कर्म है और न कारण ही है। उसका न कोई निमित्त है और न कोई उपादान है। उसमें न तर्को का स्थान है और न इन्द्रियवृत्तियाँ ही गमन कर सकती हैं | ऐसी परिस्थिति में आप बतलाइये तो ब्रह्म किस तरह कारण बनेगा ? ब्रह्म निर्धर्मक होने से ही यदि अकारण है, तो इससे वह कार्यत्वरूप लक्षण या धर्म से शून्य ही होगा | ऐसी परिस्थिति में यदि आप यह सम्भावना करें कि कार्यकारणात्मक जगत्‌ ही है, तब तो वह जगत्‌ वस्तुकृतपरिच्छेद और देश-काल कृतपरिच्छेद से रहित होकर चिदेकरसस्वरूप ब्रह्म ही बन गया, यह भी साथ-साथ भावना कर लीजिए। फिर जगत्‌भाव और कार्यकारणता रही ही कहाँ ?