Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अज्ञानं शिथिलीभूतमेवं नष्टं विदुर्बुधाः ।
न नाशेन विनोदेति पूर्वसंस्थानविच्युतिः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि ज्ञानाभ्यास के परिपाक क्रम से मूलअज्ञान का शैथिल्य हो जानेपर जगत् की
क्रमशः सूक्ष्मता हो जाने से अज्ञान के साथ-साथ जगत् का भी नाश हो जाता है, यह कहते हैँ ।
यदि अज्ञान ज्ञानादि के अभ्यास से शिथिल हो गया, तो उस प्रकार का अज्ञानजनित भ्रमात्मक
संसार भी नष्ट ही हो गया, यह ज्ञानियों का मत हे । क्योकि अज्ञान का विनाश न होने पर जगत्-रूप
आकार का विच्छेद किसी काल में नहीं हो सकता