Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कुम्भ उवाच ।
एवं जगद्भ्रमस्यास्य भावनं तावदाततम् ।
शिलीभूतस्य शीतेन सलिलस्येव रूक्षता ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्यसंकल्पभावना से दृढ़ किया गया मिथ्याभूत अर्थ-क्रियासमर्थ और दुःख का उत्पादक होता
है, यह बात देव या असुरों की माया से निर्मित शस्त्र. अस्त्र, हाथी, घोडा, सेना आदि में जब प्रसिद्ध ही
है, तब जगदीश्वर की माया से बनाये गये प्रपंच के लिए तो कहना ही क्या ? इस आशय से कहते हैं।
कुम्भ ने कहा : भद्र, यह जो सृष्टिरूपी जगत् की भ्रान्ति है, उसमें प्राणियों के प्राक्तन कर्मो
की उपभोगार्थता होने से, आपकी कथित प्रणाली के अनुसार अर्थक्रियासामर्थ्य ओर दुःख आदि की
हेतुता है, क्योकि सत्यसंकल्प परमात्मा की भावना ही तत्-तत् अर्थक्रियादिरूप से तथाकथित
सृष्टि मेँ परिणत हुई है, इसमें दृष्टान्त है - जल । जैसे जल में रक्षता या पीठ बनने की योग्यता
है नहीं, परन्तु शीत के कारण पत्थररूप (वर्फरूप) बने हुए जल में, दीर्घकाल के बाद स्फटिक
आदिरूप में परिणाम हो जाने पर रूक्षता, पीठ आदि बन जाने की अर्थक्रिया प्रसिद्ध हे । बस यही
प्रकार इस भ्रमात्मक सृष्टि के विषय में भी जानना चाहिए