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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

एषा पितामहाभावेऽप्यसती भूतसंततिः । न कदाचन तत्सिद्धं यदसिद्धेन साध्यते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

शंका के बाद उपसंहार कर प्रस्तुत विषय का निगमन करते हुए कहते हैं। वास्तव में जो सृष्टि बनानेवाले आदि ब्रह्मा पितामह हैं, उनकी भी सत्ता है नहीं, इसलिए उनके द्वारा निर्मित प्रपंच की सत्ता हो ही कैसे सकती है ? जो वस्तु असत्‌ वस्तु से सिद्ध की जाती हो, वह त्रिकाल में भी सिद्ध नहीं हो सकती