Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 95, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
अयं भूतोपलम्भो हि मृगतृष्णाम्ब्विवोदितः ।
विचाराद्विलयं याति शुक्तौ रजतधीरिव ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका फल दिखलाते हैं।
हे भद्र, यह जो भूत-सृष्टि दिखाई पड़ती है, वह मृगतृष्णाजल के सदृश मिथ्या ही उदित हुई है,
इसलिए शुक्ति में रजतज्ञान के सदुश विचार से ही उसका विलय हो जाता है