Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

वातस्य वातस्पन्दस्य यथा भेदो न विद्यते । शून्यत्वखत्वोपमयोश्चिन्मात्राहंत्वयोस्तथा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

अध्यासपक्ष में अधिष्ठान की सत्ता ही से कार्य ओर कारण दोनों में सत्ता का निर्वाह हो जाने के कारण उसमें सत्ता की प्रतीति, ज्ञान से उसका वाध और सत्‌ वस्तु की कूटस्थता अनुपपन्न नहीं हो सकती, यह आशय रखकर दृष्टान्तपूर्वक अध्यस्त की अधिष्ठान से अभिन्नता बतलाते है । महात्मन्‌, जैसे वायु ओर वायु का स्पन्दन -इन दोनो में भेद नहीं है, वैसे ही शून्यरूपता और आकाशरूपता के सदुश चैतन्यरूपता और अहंरूपता में भेद नहीं है (&)