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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 15–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verses 15–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

अणीयसामणीयश्च स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् । गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ॥ १५ ॥ ईदृशं तत्परं सूक्ष्मं तस्याग्रे यदिदं नभः । अणोः पार्श्वे महामेरुरिव स्थूलात्म लक्ष्यते ॥ १६ ॥ ईदृशं तत्परं स्थूलं यस्याग्रे यदिदं जगत् । परमाणुवदाभाति क्वचिदेव न भाति च ॥ १७ ॥ विश्वात्मकचनं नाम पदेऽसंभववेधसः । तदहंवेदनं विद्धि विराडात्मा जगत्स्थितम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

जितने छोटे-से-छोटे पदार्थ हैं, उनमें सबसे छोटा (सूक्ष्म) यही हे, जो स्थूल से भी स्थूल पदार्थ हैं, उनमें सवमे स्थूल यही है । गुरुतम पदार्थ मेँ सवसे गुरुतम ओर श्रेष्ठों में सबसे बढ़कर श्रेष्ठ भी यही है । महात्मन्‌, यह इस प्रकार अत्यन्त सूक्ष्म है कि इसके सामने यह जो आकाश हे, वह अणु के सामने स्थित स्थूलरूप महामेरु के समान स्थूल मालूम पड़ता है । और वह इतना अत्यन्त स्थूल है कि उसके सामने यह सारा ब्रह्माण्ड परमाणु के सदृश सूक्ष्मरूप से कहीं भासता है ओर कहीं भासता भी नहीं । इस तरह का मायाशबल जो अधिष्ठानरूप पद है, उसमें पूर्व के संस्कारों के उद्बोधन से उद्भूत हुआ तत्‌-तत्‌ प्राणियों के कर्म को अनुसरण करनेवाला अध्यासजनित जो विश्वरूप का प्रकाश है वही नारायण से उत्पन्न हिरण्यगर्भं का अहंभावरूप ज्ञानाध्यास है, यह आप जानिए । उस ज्ञानाध्यास में विषयरूप से स्थित्‌ जगत्‌ ही विराट्रूपी विषयाध्यास हे