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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verses 11–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verses 11–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 11-14

संस्कृत श्लोक

ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम् । महाकल्पविलासान्ते सत्सारमवशिष्यते ॥ ११ ॥ चिन्मात्रममलं शान्तमाभातं परमं नभः । समस्तकलनोन्मुक्तं युक्तं परमया धिया ॥ १२ ॥ यदेकोदितमत्यच्छं शान्तमाततमुज्ज्वलम् । परमात्मात्मकं तेजस्तिमितं ज्ञप्तिमात्रकम् ॥ १३ ॥ अप्रतर्क्यमविज्ञेयं समं शिवमनिन्दितम् । ब्रह्मनिर्वाणमापूर्णमापूर्णोदितसंविदा ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

कल्पान्त में एकमात्र बाकी बचे हुए अधिष्ठान को दिखलाते हैं। तदनन्तर जब कि महाकल्प का ताण्डव समाप्त हो जाता है, तब एकमात्र प्रसन्न गम्भीर व्यापकरूप सारवस्तु (परब्रह्म-तत्त्व) अवशिष्ट रह जाती है, वह न तो तेज से तुलित की जा सकती है और न घन अन्धकार से तुलित की जा सकती है। वह वस्तु चिन्मात्रस्वरूप है, उसमें किसी तरह का मल नहीं है, शान्ति का आधार है, चारों ओर चमकता निरवधि आकाश है, उसमें किसी प्रकार की कल्पना की ही नहीं जा सकती । जिसके विषय में मैं कुछ कह रहा हूँ, वह केवल स्वस्वरूप का साक्षात्कार करनेवाली बुद्धि से युक्त होकर जब प्रकाशित होने लग जाती है, तब अज्ञानकाल में प्रतीत अज्ञान आदि मल उसमें नहीं रहते, अतः अत्यन्त स्वच्छ हो जाती हे । क्रोधादिविकार उसमें रहते नहीं, चारों ओर उसकी सत्ता है, उज्ज्वल परमात्मस्वरूप वही प्रसन्न ज्ञानरूप तेज है। उसमें अनुमानादि तर्को का प्रसार होता नहीं । वह बाह्य इन्द्रियो की विषय नहीं है, वह सम, शिव और अनिन्दित हे । जिसको ब्रह्मनिर्वाण कहते हैं, वह वही है । सर्वत्र पूर्णरूप से उदित आत्म-ज्ञान से नितान्त पूर्णं हे