Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 96, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 96, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 96 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
यदिदं दृश्यते किंचिज्जगत्स्थावरजंगमम् ।
सर्वं सर्वप्रकाराढ्यं कल्पान्ते तद्विनश्यति ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले अध्यास की सामग्री बतलाने के लिए अध्यारोप कर संस्कारसहकृत अज्ञानशवल
अधिष्ठान का दिग्दर्शन करानेवाले कुम्भमुनि पूर्वसृष्टि का प्रलय दर्शाते हैं ।
राजन्, यह जो कुछ भी स्थावर, जंगम नानाविध आकार प्रकार से भरा हुआ जगत् दिखाई पडता
है वह सब कल्प की समाप्ति में विनष्ट हो जाता हे