Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 97, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अहंभावजगच्छब्दशब्दार्थरसरञ्जनम् ।
कार्यं न कारणाभावात्पदार्थे तूपपद्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तव अकारणक ही यह जगत् माना जाय, इस तरह के यद्च्छावादिपक्ष का निरास करते है।
कारण का अभाव रहने पर किसी भी पदार्थ में कार्य उत्पन्न नहीं होता । जगत् में द्वित्व, एकत्व
आदि का जो भान होता हे, वह आकाशपुष्प के सदृश विकल्पमात्र ही हे