Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 97, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
कार्यस्य कस्यचिन्नाम तेन सर्गो न विद्यते ।
न चान्यथोपपत्तिर्हि सर्गस्यास्योपपद्यते ॥ १० ॥
चिन्मात्रकादृते तस्माज्जडसर्गो न विद्यते ।
यदिदं दृश्यते किंचित्तच्चिद्धनमिवोत्थितम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति के अध्यास के बिना दूसरे किसी भी उपाय से सृष्टि की उपपत्ति नहीं हो सकती, यह
कहते हैं ।
चैतन्य के अध्यास के बिना इस सृष्टि की दूसरी कोई उपपत्ति है ही नहीं, जिससे कि उसका
उपपादन किया जाय, इससे जड सर्ग का अस्तित्व रहता ही नहीं । जो भी कुछ यह नेत्र के सामने नृत्य
करता है, वह एक तरह से अज्ञानवश चैतन्यघन ही स्फुरित हो रहा है । वही अहम्भाव, जगत् आदि शब्द
ओर शब्दार्थरूप रसों से रजित-सा होकर भासता है