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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 97, Verses 8–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 97, verses 8–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 97 · श्लोक 8 ,9

संस्कृत श्लोक

असत्त्वात्तेन परमे स्वच्छभावव्यवस्थता । यदि कारणतापत्तियोग्यं शान्तं पदं भवेत् ॥ ८ ॥ अनिङ्गितमनाभासमप्रतर्क्यं कथं भवेत् । अतो न कारणं नैव बीजं ब्रह्म कदाचन ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि अस्वच्छभाव का सर्वथा अपलाप क्यो करते हैं - स्वच्छ चिद्रूप ही अस्वच्छ जगत्भाव के प्रति कारण बनने योग्य है, यों कल्पना क्यो नहीं करते, तो इस पर कहते हैं। भद्र, यदि प्रशान्त ब्रह्मरूप पद अस्वच्छ जगत्‌ के प्रति कारण बनने के लिए योग्य है, तो श्रुति आदि में निष्क्रिय, अगम्य, अप्रतक्य आदि शब्दों से जो वह कहा गया है, उसकी उपपत्ति किस तरह होगी ? इन सब युक्तियों से यह निश्चित होता है कि ब्रह्म किसी भी कार्य का न निमित्त कारण है ओर न उपादान कारण ही है, अतः इस सर्ग का अस्तित्व किसी काल में है ही नहीं