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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

नास्त्येव जगदेवेदं यच्चेदं किंचनोदितम् । ब्रह्मैवास्तीह सकलं केन तद्बुध्यते कथम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो कुछ भी यह उदित जगत्‌ है, वह कुछ है ही नहीं, यहाँ यदि कुछ है, तो सब ब्रह्म ही है, अतः किससे क्या किस तरह जाना जाय