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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 98, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 98, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 98 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

उपादानात्मकादीनां कारणानामभावतः । अकारणं च भावानामशेषाणां त्वसंभवात् ॥ ६ ॥ एवमज्ञानबुद्ध्यात्म जगत्तस्मान्न विद्यते । तस्माद्यदिदमाभाति भासनं ब्रह्म नेतरत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रकृत अर्थ के साधन में पूर्वोक्त युक्ति भी समर्थ है। उपादान आदि कारणरूप से जो प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है और जितने भावरूप से प्रसिद्ध हैं, उनका भी अस्तित्व नहीं है, इसलिए ब्रह्म कारण नहीं है और इस जगत्‌ का भी कोई कारण नहीं है। यों अज्ञानजनित भ्रान्तिरूप ही जगत्‌ है, इसलिए उसकी किसी काल में सत्ता नहीं है। अत: यह जो दिखाई पड़ता है, वह भासनात्मक ब्रह्म ही है, दूसरा नहीं