Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 99, Verses 12–13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 99, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 99 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
यद्बन्धमोक्षसंकल्पशब्दार्थानां सदा सताम् ।
स्वरूपवेदनं तत्सत्केवलत्वं च कथ्यते ॥ १२ ॥
अनहंवेदनं सिद्धिरहंवेदनमापदः ।
सोऽहमेवानहमिति शुद्धबोधो भवात्मवान् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
मोक्ष क्या है, यह कहते हैं।
सदा क्रमशः हो रहे बन्ध-मोक्ष तथा संकल्पादि शब्दार्थो का साक्षिभूत जो स्वरूप-ज्ञान है वही
सद्ब्रह्म ओर कैवल्य कहा जाता हे । अहंकारज्ञान का अज्ञान मोक्ष है तथा अहंकारज्ञान ही बन्ध हे ।
इसलिए हे राजन्, मैं वह ब्रह्म ही हूँ, अहं पदार्थ मैं नहीं हूँ” इस तरह के शुद्ध कैवल्यात्मक बोध से युक्त
होकर आत्मवान् बन जाइये