Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
किल तूष्णीं स्थितेनैव तत्पदं प्राप्यते परम् ।
परमं यत्र साम्राज्यमपि राम तृणायते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि संकल्प की चेष्टा छोड़कर एकमात्र चुपचाप
स्थित रहने से ही वह परम पद प्राप्त हो जाता है, जहाँ पर यह सम्पूर्णं हिरण्यगर्भ तक का भी
साम्राज्य तृण की नाई तुच्छ बन जाता है