Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
गम्यदेशैकनिष्ठस्य यथा पान्थस्य पादयोः ।
स्पन्दो विगतसंकल्पस्तथा स्पन्दस्व कर्मसु ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राक्तन छकल्यग्रयुक्त कियाओं के वेग से ही वेगक्षययर्यन्त जो व्यवहार की चिद्धि होती हैं,
उमे पहले कहे यये दृष्टान्त को फिर कहते हैं /
अपने एकमात्र गन्तव्यस्थान गृह आदि की ओर जाने के लिए तत्पर पथिक के पैर में स्पन्दन
बिना संकल्प के ही प्रतिक्षण होते रहते हैं यानी उस पथिक के पैर अपने अभीष्ट स्थान की ओर
जाने के लिए संकल्परहित ही होकर बे-रोक-टोक उठते जाते हैं, वैसे ही हे श्रीरामजी, आप भी
संकल्पशून्य होकर ही अपने कर्मों मे स्पन्दन करते चलिये